आईसीएआर-आईआईएमआर के अनुसार इंटरक्रॉपिंग मॉडल के तहत खेती करने पर गन्ने की उपज में करीब 28 फीसदी बढ़ोतरी हुई और मक्का से 3.5- 5 टन प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त उत्पादन मिला। इससे किसानों की आय 50,000 से 1 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक बढ़ गई। वहीं, मक्का की लागत भी पहले के मुकाबले लगभग 75 फीसदी कम हो गई।
अब किसान गन्ने के खेत में मक्का की खेती भी कर सकते हैं। आईसीएआर भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना (आईसीएआर-आईआईएमआर) ने गन्ना + मक्का (एसएम) इंटरक्रॉपिंग का नया मॉडल विकसित किया है। इस मॉडल से देश में मक्का और गन्ने के उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। दरअसल, पहले गन्ने के साथ इंटरक्रॉपिंग केवल प्याज और लहसुन जैसी सब्जियों तक सीमित थी। कीट और प्रबंधन की समस्याओं के कारण किसान इसे ज्यादा नहीं अपना रहे थे। लेकिन अब कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि मक्के की खेती गन्ने के साथ सबसे ज्यादा उपयुक्त है। इससे गन्ने की उपज में 28 फीसदी बढ़ोतरी होगी और मक्का से 3.5- 5 टन प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त उत्पादन मिलेगा। साथ ही 50,000 से 1 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक कमाई बढ़ेगी।
दरअसल, इंटरक्रॉपिंग योजना केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सहयोग से चलाई जा रही है। इस योजना का उद्देश्य खेत की उत्पादन क्षमता बढ़ाना, सालभर इथेनॉल प्लांट्स के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराना और किसानों की इनकम में इजाफा करना है। आईसीएआर-आईआईएमआर के अनुसार मक्के की अवधि छोटी होती है और गन्ने की खेती के तरीकों के साथ मेल खाती है। इसलिए गन्ने के साथ इसकी खेती करना किसानों के लिए लाभदायद होगा।
अभी महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में आईसीएआर-आईआईएमआर के वैज्ञानिकों ने एक नया तरीका अपनाया है। गन्ने की शुरुआती धीमी बढ़त के समय 100 दिन में तैयार होने वाली मक्का लगाई जाती है। इससे किसान एक साथ दो फसलें उगा सकते हैं। बड़ी बात यह है कि इंटरक्रॉपिंग में पानी, खाद और दवाइयों का खर्च भी पहले की तरह रहता है। यानि किसान एक ही खर्च में दो फसल एक साथ उगा सकते हैं।
आईसीएआर-आईआईएमआर के मुताबिक, सोलापुर और बुलंदशहर में 50 एकड़ के पायलट प्रोजेक्ट से पता चला कि गन्ना + मक्का मॉडल बहुत फायदेमंद है। सही तरीके अपनाने से फसल की पैदावार बढ़ती है। इसके लिए मक्का के पौधों की संख्या संतुलित रखी जाती है, अतिरिक्त यूरिया दिया जाता है और सही समय पर डिटॉपिंग की जाती है। डिटॉपिंग से गन्ने को अधिक धूप मिलती है, हरा चारा मिलता है और मक्का के दाने खेत में ही अच्छी तरह सूख जाते हैं. इससे किसानों की कमाई बढ़ाने में मदद मिलती है।
आईसीएआर-आईआईएमआर के अनुसार इस मॉडल के तहत खेती करने पर गन्ने की उपज में करीब 28 फीसदी बढ़ोतरी हुई और मक्का से 3.5- 5 टन प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त उत्पादन मिला। इससे किसानों की आय 50,000 से 1 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक बढ़ गई। वहीं, मक्का की लागत भी पहले के मुकाबले लगभग 75 फीसदी कम हो गई। इस तरीके से खर्च कम हुआ, मिट्टी की सेहत सुधरी और इथेनॉल प्लांट्स के लिए सालभर मक्का मिलना संभव हुआ।
आईसीएआर-आईआईएमआर का कहना है कि एसएम मॉडल को बड़े स्तर पर अपनाया जा सकता है। अगर गन्ने की करीब 50 फीसदी जमीन (लगभग 15 लाख हेक्टेयर) पर इसे लागू किया जाए, तो हर साल 40- 60 लाख टन मक्का पैदा हो सकता है। इससे देश की करीब 500 गन्ना आधारित इथेनॉल फैक्ट्रियों को लगातार कच्चा माल मिल सकेगा। सोलापुर में हुए प्रयोग से किसान प्रेरित हुए हैं, जहां उन्हें जल्दी पैसा मिलने, कम जोखिम और ज्यादा मुनाफे का फायदा दिखा। यानि यह तरीका दिखाता है कि वैज्ञानिक तकनीक से खेसती को बेहतर बनाया जा सकता है।
बता दें कि गन्ना देश की एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यवसायिक फसल है और लगभग 54 लाख हेक्टेयर में उगाई जाती है। इसका मुख्य उत्पादन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में होता है। गन्ना आमतौर पर एक ही बार उगाई जाती है और किसान इसे 10-15 महीने बाद बेचकर ही आमदनी कमाते हैं।
इस दौरान उन्हें अपने खर्चों के लिए अक्सर दलालों या छोटे ऋण पर निर्भर रहना पड़ता है। वहीं, चीनी मिलें साल में सिर्फ 3-5 महीने ही चलती हैं, जिससे इथेनॉल उत्पादन सीमित रहता है, जबकि गन्ना भारत की इथेनॉल जरूरत का 30 से 35 फीसदी देता है।